सिंदूर के उपाय
सिंदूर के उपाय
👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻
सिंदूर नारंगी रंग का चमकीला चूर्ण होता है जिसे हिन्दू विवाहित स्त्रियां अपनी मांग में इसलिए भरती है क्योंकि इससे पति की उम्र लंबी होती हो घर में सुख शांति बनी रहती है। हिन्दू देवियों की पूजा सिंदूर के इस्तेमाल के बिना अधूरी है। इसके अलावा चमेली के तेल के साथ सिंदूर हनुमानजी को चढ़ाया जाता है। हनुमानजी को पांच मंगलवार और पांच शनिवार को चमेली का तेल और सिंदूर अर्पित करके गुड़ और चने की प्रसाद बांटें। सभी संकटों का
समाधान हो जाएगा।
सिंदूर कमीला जतन नामक पौधे की फली में से निकलता है। बीस से पच्चीस फीट ऊंचे इस वृक्ष में फली गुच्छ के रूप में लगती है। फली के अंदर के भाग का आकार मटर की फली जैसा होता है जिसमें सरसों के आकार से थोड़े मोटे दाने होते हैं जो लाल रंग के पराग से ढके होते हैं जिससे विशुद्ध सिंदूर निकलता है। आइए जानते हैं सिंदूर के विशेष टोटके..
👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻
पहला सिंदूरी टोटका
पद, प्रतिष्ठा व सम्मान के लिए : एक पान की पत्ते पर थोड़ा-सा फिटकरी और सिंदूर बांधकर बुधवार की सुबह या शाम को पीपल के पेड़ के नीचे किसी बड़े पत्थर से दबा कर आ जाएं। पीछे पलटकर न देखें। यह कार्य 3 बुधवार तक करें।
दूसरा सिंदूरी टोटका
दरवाजे पर सिंदूर क्यों : वास्तु शास्त्र के अनुसार दरवाजे पर तेल में मिश्रित सिंदूर लगाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता है। यह घर में मौजूद वास्तुदोष को भी दूर करने में कारगर माना जाता है। इसके अलावा ऐसी भी मान्यता है कि दरवाजे पर सिंदूर लगाने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। घर के मुख्य द्वार पर सिंदूर चढ़ी हुई गणेश प्रतिमा लगाने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
तीसरा सिंदूरी टोटका
आर्थिक तंगी से मुक्ति : यदि आप आए दिन आर्थिक तंगी से परेशान रहते हैं तो एकाक्षी नारियल पर सिंदूर लगाकर उसे लाल वस्त्र में बांधकर उसकी पूजा करें और फिर उसे मां लक्ष्मी से धन की प्रार्थना करते हुए अपने व्यवसाय स्थल सुरक्षित जगह पर रख दें। इसके प्रभाव से धन की समस्या दूर होने लगेगी।
चौथा सिंदूरी टोटका
सूर्य-मंगल की शांति हेतु : यदि सूर्य और मंगल आपके लिए मारक ग्रह है और उनकी महादशा या अंतर्दशा चल रही है, तो सिंदूर को बहते जल में प्रवाहित करें। ऐसा करने से संबंधित ग्रह का प्रभाव कम हो जाता है और सूर्य तथा मंगल शुभ फल देने लगते हैं।
पांचवां सिंदूरी टोटका
रक्तदोष दूर करने हेतु : यदि रक्त संबंधी किसी रोग से पीड़ित हैं, तो सिंदूर को अपने ऊपर से वारकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। यह उपाय कम से कम पांच बार करेंगे तो शीघ्र ही रोग शांत हो जाएगा।
छठा सिंदूरी टोटका
परीक्षा में सफलता हेतु : गुरु पुष्य योग या शुक्ल पक्ष के पुष्य योग में श्री गणेशजी के मंदिर में सिन्दूर का दान करने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है, किसी भी तरह की परीक्षा में मेहनत से अधिक सफलता मिलेगी।
सातवां सिंदूरी टोटका
नौकरी पाने हेतु : किसी भी शुक्ल पक्ष के गुरुवार के दिन एक पीले वस्त्र पर अपनी अनामिका अंगुली का प्रयोग कर केसर मिश्रित सिंदूर से 63 नंबर लिख लें। फिर उसे ले जाकर माता लक्ष्मी के मंदिर में माता के चरणों में अर्पित कर दें। ऐसा 3 गुरुवार तक करें।
आठवां सिंदूरी टोटका
दुर्घटना भय से मुक्ति : जिन लोगों को आए दिन वाहनादि से दुर्घटना का सामना करना पड़ता है उन्हें चाहिए कि वे मंगलवार के दिन श्रीहनुमानजी के मंदिर में सिंदूर दान करें। इस उपाय से शीघ्र ही दुर्घटना का भय आदि समाप्त हो जाएगा।
नौवां सिंदूरी टोटका
पति पत्नी में प्रेम हेतु : रात को सोते समय पत्नी अपनी पति के तकिये के नीचे सिंदूर की एक पुड़िया और पति अपनी पत्नी के तकिये के नीचे कर्पूर की दो टिकिया रख दें। प्रात: होते ही सिंदूर की पुड़िया घर से बाहर फेंक दें और कपूर को निकाल कर कमरे में जला दें।
दसवां सिंदूरी टोटका
धन लाभ हेतु : काली हल्दी को सिंदूर लगाकर और धूप दिखाकर लाल वस्त्र में लपेटकर एक दो मुद्रा सहित बक्से में रख लें। इसके प्रभाव से धन की वृद्धि होती रहेगी।
* एक नारियल पर कामिया सिंदूर, मौली तथा बासमती चावल अर्पित करके उसका पूजन करें और फिर उसे हनुमान मन्दिर में जाकर चढ़ा आएं, धन लाभ होगा।
ग्यारहवां सिंदूरी टोटका
कर्ज मुक्ति हेतु : यदि आप कर्ज से परेशान हैं, तो सियार सिंगी लेकर उसे एक डिब्बी में रख लें और उसे प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में सिंदूर चढ़ाते रहें। ऐसा करने से शीघ्र ही शुभ फल मिलेगा। इसके अलवा तिजोरी में सिंदूर युक्त हत्था जोड़ी रखने से भी आर्थिक लाभ होगा।
अँगूठा और भाग्य
अंगूठे से ऐसे तय होता है वर-वधु का भाग्य

हाथ की रेखाएं

विवाह के लिए उपयुक्त वर और कन्या का चुनाव करना बहुत कठिन है, उससे भी ज्यादा कठिन है उन दोनों की कुंडली का आपस में मिलना। निःसंदेह एक सफल विवाह के अंतर्गत वर-वधु के स्वभाव और प्राथमिकताओं में सामंजस्य होना बहुत जरूरी है जो कि उनके हाथों की रेखाओं द्वारा स्पष्ट प्रदर्शित होता है।

अंगूठे का महत्व

इंसान के हाथ की रेखाएं उसके वर्तमान जीवन की बात कहती हैं लेकिन रेखाओं के अलावा आपके हाथ का अंगूठा भी इस मामले में बहुत कारगर है।

वर्तमान स्वभाव

अगर आप नहीं जानते तो हम आपको बताते हैं कि व्यक्ति के हाथ का अंगूठा उसके भविष्य के साथ-साथ उसके वर्तमान के स्वभाव और चरित्र को भी बखूबी बयां करता है।

प्राण है अंगूठा

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार हाथ का अंगूठा भविष्य के प्राण के समान है। अगर किसी व्यक्ति को हाथ के अंगूठे को पढ़ना आता है तो वह संबंधित व्यक्ति के व्यक्तित्व की तह तक खोल सकता है।

अकेला अंगूठा

चार अंगुलियों के सामने अंगूठा अकेला होता है, लेकिन एक अंगूठे के बिना उन चार अंगुलियों का भी कोई मोल नहीं है। अलग-अलग भावों में अंगूठे की अपनी अलग और विशेष भूमिका है।

मुट्ठी में है तकदीर

अंगूठे की सहायता के बिना मुट्ठी बंद नहीं की जा सकती और यह बात तो सभी जानते हैं कि बंद मुट्ठी में ही इंसान की तकदीर होती है

गलत निर्णय

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार अंगूठा स्वत: ही आपके निर्णय को सही या गलत साबित कर सकता है। महान हस्तरेखा विज्ञानी कीरो का कहना था कि अंगूठा ही स्वयं ईश्वर का प्रतिनिधि है। न्यूटन ने तो यहां तक कहा था कि ईश्वर से साक्षात्कार के लिए अंगूठा ही काफी है।

अंगूठे की खासियत

चलिए बताते हैं क्या खासियत छिपी है हाथ के इस अंगूठे के भीतर:

निर्णय के दौरान

अगर आप किसी निर्णय पर पहुंचना चाहते हैं, काफी लंबे समय से आपके भीतर किसी विशेष समस्या को लेकर मंथन चल रहा है। अचानक आप किसी निर्णय पर पहुंचे और निर्णय लेते समय आपके हाथ का अंगूठा, अंगुलियों के नीचे हैं तो समझ जाइए यह निर्णय आपके लिए नकारात्मक साबित होगा।

नियंत्रित स्थिति

अगर किसी से लड़ते या क्रोधित होते समय हाथ की अंगुलियां, अंगूठे के ऊपर हो तो स्थिति अनियंत्रित हो सकती है, वहीं अगर अंगूठा ऊपर हो और अंगुलियां नीचे तो स्थिति निश्चित तौर पर नियंत्रण में है।

दक्षिण स्थान

शास्त्रों में भी अंगूठे की जड़ में ब्रह्मतीर्थ कहा गया है, पितरों को तर्पण करने के लिए अंगूठा ही काम आता है। दक्षिण में पितरों का स्थान माना जाता है और दाएं हाथ का अंगूठा भी दक्षिण में ही स्थित है।

तीन पोरें

अंगूठे में सामान्यतौर पर तीन पोरें होती हैं। जिनमें से पहली पोर इच्छा शक्ति, दूसरी तर्क शक्ति और तीसरी जो शुक्र पर्वत से जुड़ती है, गृहस्थ जीवन या प्रेम संबंधों में सुख-शांति को दर्शाती है।

समान पोरें

जिस व्यक्ति का अंगूठा चौड़ा, सीधा और सभी पोरों में समान रूप से बंटा होता है वह व्यक्ति समय के महत्व को समझता है और धन का अपव्यय करने से बचता है। ऐसे व्यक्ति समाज की बातें ज्यादा नहीं मानते, अपनी इच्छा से ही सही-गलत का निर्णय करते हैं।

भविष्य का निर्धारण

ऐसा व्यक्ति किसी भी काम के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहता व अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करने के लिए तैयार रहता है।

मजबूत अंगूठा

सुदृढ़ और मजबूत अंगूठे वाला व्यक्ति महत्वाकांक्षी, कर्तव्य का पालन करने वाला और अच्छे स्वभाव वाला होता है। वह दूसरों के साथ जानबूझकर कभी गलत नहीं करता।

लचीला अंगूठा

वहीं जिस व्यक्ति का अंगूठा मजबूत ना होकर थोड़ा लचीला होता है वह वक्त के साथ-साथ खुद को बदलने में विश्वास रखता है। वह मृदुभाषी होने के साथ-साथ ज्यादा अड़ियल नहीं होता।

अपराधी प्रवृत्ति

जिस व्यक्ति के अंगूठे की पहली पोर मोटी और छोटी होती है वे बिना सोचे-समझे जीवन जीने में विश्वास करते हैं। ऐसे व्यक्ति किसी भी समय कुछ भी बोलते हैं और बात-बात पर क्रोधित होते हैं। जिन लोगों के दोनों हाथों के अंगूठों की पहली पोरें छोटी और मोटी होती हैं, उनमें गहरी अपराधी प्रवृत्ति देखी जा सकती है।

कोमल स्वभाव

चौकोर अंगूठा सामान्य बुद्धि-विवेकशीलता का द्योतक है। वहीं नुकीले अंगूठे वाला व्यक्ति शीघ्र काम कर सकने में सक्षम होता है। चपटे अंगूठे वाले लोग स्वभाव से कोमल होने के अलावा किसी से बैर नहीं रखते।

चालाक व्यक्ति

चौड़े अंगूठे वाले लोग अपने मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर सफलता पाने में सक्षम होते हैं। यदि अंगूठे का बीच वाला भाग पतला होता है तो वह व्यक्ति चतुर और चालाक होता है। वह किसी भी रूप में अपना काम निकाल सकता है।

लो सेट और हाइ सेट

अंगूठे को दो भागों में विभाजित किया जाता है, लो सेट अंगूठा और हाइ सेट अंगूठा। अगर किसी व्यक्ति का अंगूठा गुरु पर्वत से दूर है तो उसे लो सेट अंगूठा कहेंगे। गुरु पर्वत से नजदीक होने वाले अंगूठे को हाइ सेट अंगूठा माना जाएगा।

गुरु पर्वत

अंगूठा जितना ज्यादा ऊंचा और गुरु पर्वत के नजदीक होगा व्यक्ति उतना ही कम बुद्धि वाला होगा। मंद बुद्धि लोग इसी श्रेणी में आते हैं। वहीं दूसरी ओर लो सेट अंगूठे वाले लोग, काफी मिलनसार, विवेकशील, बेहतरीन वक्ता, ज्ञाता और बुद्धिमान प्रवृत्ति के होते हैं।

अहंकार

विवाह के समय यह बात जरूर देखनी चाहिए कि संबंधित महिला-पुरुष, दोनों के ही अंगूठे सीधे ना हों। ऐसा होने पर दोनों में टकराहट रहती है। साथ ही अंगूठे ज्यादा लचीले भी ना हों तो कोई भी निर्णय ले पाने की क्षमता वाला नहीं होगा।

बना रहे सामंजस्य

एक सफल विवाह में जरूरी है कि एक का अंगूठा लचीला और दूसरे का थोड़ा मजबूत हो ताकि सामंजस्य बना रहे।
अंगूठा
गाय के शुभ शकुन
गाय के  11 शुभ
शुभ शकुन
शकुन

गाय बेहद शांत और सौम्य पशु है। हिन्दू धर्म में यह पवित्र और पुजनीय मानी गई है। यहां तक कि ज्योतिष के कई बड़े शास्त्रों में गाय की विशेष महिमा बताई गई है। आइए जानें गाय के 11 शुभ शकुन...जो चौंकाने वाले हैं....*

1. ज्योतिष में गोधू‍लि का समय विवाह के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

2. यदि यात्रा के प्रारंभ में गाय सामने पड़ जाए अथवा अपने बछड़े को दूध पिलाती हुई सामने आ जाए तो यात्रा सफल होती है।

3. जिस घर में गाय होती है, उसमें वास्तुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है।

4. जन्मपत्री में यदि शुक्र अपनी नीच राशि कन्या पर हो, शुक्र की दशा चल रही हो या शुक्र अशुभ भाव (6, 8, 12)- में स्‍थित हो तो प्रात:काल के भोजन में से एक रोटी सफेद रंग की गाय को खिलाने से शुक्र का नीचत्व एवं शुक्र संबंधी कुदोष स्वत: समाप्त हो जाता है।

5. पितृदोष से मुक्ति- सूर्य, चंद्र, मंगल या शुक्र की युति राहु से हो तो पितृदोष होता है। यह भी मान्यता है कि सूर्य का संबंध पिता से एवं मंगल का संबंध रक्त से होने के कारण सूर्य यदि शनि, राहु या केतु के साथ स्थित हो या दृष्टि संबंध हो तथा मंगल की यु‍ति राहु या केतु से हो तो पितृदोष होता है। इस दोष से जीवन संघर्षमय बन जाता है। यदि पितृदोष हो तो गाय को प्रतिदिन या अमावस्या को रोटी, गुड़, चारा आदि खिलाने से पितृदोष समाप्त हो जाता है।

6. किसी की जन्मपत्री में सूर्य नीच राशि तुला पर हो या अशुभ स्‍थिति में हो अथवा केतु के द्वारा परेशानियां आ रही हों तो गाय में सूर्य-केतु नाड़ी में होने के फलस्वरूप गाय की पूजा करनी चाहिए, दोष समाप्त होंगे।

7. यदि रास्ते में जाते समय गोमाता आती हुई दिखाई दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने देना चाहिए, यात्रा सफल होगी।

8. यदि बुरे स्वप्न दिखाई दें तो मनुष्य गोमाता का नाम ले, बुरे स्वप्न दिखने बंद हो जाएंगे।

9. गाय के घी का एक नाम आयु भी है- 'आयुर्वै घृतम्'। अत: गाय के दूध-घी से व्यक्ति दीर्घायु होता है। हस्तरेखा में आयुरेखा टूटी हुई हो तो गाय का घी काम में लें तथा गाय की पूजा करें।

10. देशी गाय की पीठ पर जो ककुद् (कूबड़) होता है, वह 'बृहस्पति' है। अत: जन्म पत्रिका में यदि बृहस्पति अपनी नीच राशि मकर में हों या अशुभ स्थिति में हों तो देशी गाय के इस बृहस्पति भाग एवं शिवलिंगरूपी ककुद् के दर्शन करने चाहिए। गुड़ तथा चने की दाल रखकर गाय को रोटी भी दें।

11. गोमाता के नेत्रों में प्रकाश स्वरूप भगवान सूर्य तथा ज्योत्स्ना के अधिष्ठाता चन्द्रदेव का निवास होता है। जन्मपत्री में सूर्य-चन्द्र कमजोर हो तो गोनेत्र के दर्शन करें, लाभ होगा।
जय श्री हरि💐🙏🚩                                        जन हित मे शेयर करें        
ग्रह बाधा के संकेत
*ग्रह बाधा होने से पूर्व मिलते हैं ये संकेत*


ग्रह अपना शुभाशुभ प्रभाव गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर्दशा में देते हैं । जिस ग्रह की दशा के प्रभाव में हम होते हैं, उसकी स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल हमें मिलता है । जब भी कोई ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल प्रबल रुप में देने वाला होता है, तो वह कुछ संकेत पहले से ही देने लगता है ।इनके उपाय करके बढ़ी समस्याओं से बचा जा सकता है | ऐसे ही कुछ पूर्व संकेतों का विवरण यहाँ दृष्टव्य है –

सूर्य के अशुभ होने के पूर्व संकेत –

> सूर्य अशुभ फल देने वाला हो, तो घर में रोशनी देने वाली वस्तुएँ नष्ट होंगी या प्रकाश का स्रोत बंद होगा । जैसे – जलते हुए बल्ब का फ्यूज होना, तांबे की वस्तु खोना ।


> किसी ऐसे स्थान पर स्थित रोशनदान का बन्द होना, जिससे सूर्योदय से दोपहर तक सूर्य का प्रकाश प्रवेश करता हो । ऐसे रोशनदान के बन्द होने के अनेक कारण हो सकते हैं ।

जैसे – अनजाने में उसमें कोई सामान भर देना या किसी पक्षी के घोंसला बना लेने के कारण उसका बन्द हो जाना आदि ।

> सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । सूर्य जन्म-कुण्डली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है । यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है । सूर्य लग्नेश हो, तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है । मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है ।

> किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्य-पक्ष से परेशानी ।
> यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम ।
> शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द ।

> किसी कारण से फसल का सूख जाना ।
> व्यक्ति के मुँह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है ।

> सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है ।
> तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है ।
*चन्द्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> जातक की कोई चाँदी की अंगुठी या अन्य आभूषण खो जाता है या जातक मोती पहने हो, तो खो जाता है ।

> जातक के पास एकदम सफेद तथा सुन्दर वस्त्र हो वह अचानक फट जाता है या खो जाता है या उस पर कोई गहरा धब्बा लगने से उसकी शोभा चली जाती है ।

> व्यक्ति के घर में पानी की टंकी लीक होने लगती है या नल आदि जल स्रोत के खराब होने पर वहाँ से पानी व्यर्थ बहने लगता है । पानी का घड़ा अचानक टूट जाता है ।

> घर में कहीं न कहीं व्यर्थ जल एकत्रित हो जाता है तथा दुर्गन्ध देने लगता है ।

*उक्त संकेतों से निम्नलिखित विषयों में अशुभ फल दे सकते हैं ->*

> माता को शारीरिक कष्ट हो सकता है या अन्य किसी प्रकार से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है ।

> नवजात कन्या संतान को किसी प्रकार से पीड़ा हो सकती है ।

> मानसिक रुप से जातक बहुत परेशानी का अनुभव करता है ।

> किसी महिला से वाद-विवाद हो सकता है ।

> जल से जुड़े रोग एवं कफ रोगों से पीड़ा हो सकती है । जैसे – जलोदर, जुकाम, खाँसी, नजला, हेजा आदि ।

> प्रेम-प्रसंग में भावनात्मक आघात लगता है ।

> समाज में अपयश का सामना करना पड़ता है । मन में बहुत अशान्ति होती है ।

> घर का पालतु पशु मर सकता है ।

> घर में सफेद रंग वाली खाने-पीने की वस्तुओं की कमी हो जाती है या उनका नुकसान होता है । जैसे – दूध का उफन जाना ।

> मानसिक रुप से असामान्य स्थिति हो जाती है ।
*मंगल के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> भूमि का कोई भाग या सम्पत्ति का कोई भाग टूट-फूट जाता है ।


> घर के किसी कोने में या स्थान में आग लग जाती है । यह छोटे स्तर पर ही होती है ।


> किसी लाल रंग की वस्तु या अन्य किसी प्रकार से मंगल के कारकत्त्व वाली वस्तु खो जाती है या नष्ट हो जाती है ।


> घर के किसी भाग का या ईंट का टूट जाना ।


> हवन की अग्नि का अचानक बन्द हो जाना ।


> अग्नि जलाने के अनेक प्रयास करने पर भी अग्नि का प्रज्वलित न होना या अचानक जलती हुई अग्नि का बन्द हो जाना ।


> वात-जन्य विकार अकारण ही शरीर में प्रकट होने लगना ।
> किसी प्रकार से छोटी-मोटी दुर्घटना हो सकती है ।   *बुध के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> व्यक्ति की विवेक शक्ति नष्ट हो जाती है अर्थात् वह अच्छे-बुरे का निर्णय करने में असमर्थ रहता है ।


> सूँघने की शक्ति कम हो जाती है ।


>काम-भावना कम हो जाती है ।


>त्वचा के संक्रमण रोग उत्पन्न होते हैं । पुस्तकें, परीक्षा ले कारण धन का अपव्यय होता है । शिक्षा में शिथिलता आती है ।                                            *गुरु के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> अच्छे कार्य के बाद भी अपयश मिलता है ।


> किसी भी प्रकार का आभूषण खो जाता है ।


> व्यक्ति के द्वारा पूज्य व्यक्ति या धार्मिक क्रियाओं का अनजाने में ही अपमान हो जाता है या कोई धर्म ग्रन्थ नष्ट होता है ।


> सिर के बाल कम होने लगते हैं अर्थात् व्यक्ति गंजा होने लगता है ।


> दिया हुआ वचन पूरा नहीं होता है तथा असत्य बोलना पड़ता है ।                                                *शुक्र के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> किसी प्रकार के त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे – दाद, खुजली आदि उत्पन्न होते हैं ।


> स्वप्नदोष, धातुक्षीणता आदि रोग प्रकट होने लगते हैं ।


> कामुक विचार हो जाते हैं ।


> किसी महिला से विवाद होता है ।


> हाथ या पैर का अंगुठा सुन्न या निष्क्रिय होने लगता है ।                                                                  *शनि के अशुभ होने के पूर्व संकेत*


> दिन में नींद सताने लगती है ।


> अकस्मात् ही किसी अपाहिज या अत्यन्त निर्धन और गन्दे व्यक्ति से वाद-विवाद हो जाता है ।


> मकान का कोई हिस्सा गिर जाता है ।


> लोहे से चोट आदि का आघात लगता है ।


> पालतू काला जानवर जैसे- काला कुत्ता, काली गाय, काली भैंस, काली बकरी या काला मुर्गा आदि मर जाता है ।


> निम्न-स्तरीय कार्य करने वाले व्यक्ति से झगड़ा या तनाव होता है ।


> व्यक्ति के हाथ से तेल फैल जाता है ।


> व्यक्ति के दाढ़ी-मूँछ एवं बाल बड़े हो जाते हैं ।


> कपड़ों पर कोई गन्दा पदार्थ गिरता है या धब्बा लगता है या साफ-सुथरे कपड़े पहनने की जगह गन्दे वस्त्र पहनने की स्थिति बनती है ।


> अँधेरे, गन्दे एवं घुटन भरी जगह में जाने का अवसर मिलता है ।।                                                       *राहु के अशुभ होने के पूर्व संकेत ->*


> मरा हुआ सर्प या छिपकली दिखाई देती है ।


> धुएँ में जाने या उससे गुजरने का अवसर मिलता है या व्यक्ति के पास ऐसे अनेक लोग एकत्रित हो जाते हैं, जो कि निरन्तर धूम्रपान करते हैं ।


> किसी नदी या पवित्र कुण्ड के समीप जाकर भी व्यक्ति स्नान नहीं करता


> पाला हुआ जानवर खो जाता है या मर जाता है ।


> याददाश्त कमजोर होने लगती है ।


> अकारण ही अनेक व्यक्ति आपके विरोध में खड़े होने लगते हैं ।


> हाथ के नाखुन विकृत होने लगते हैं ।


> मरे हुए पक्षी देखने को मिलते हैं ।


> बँधी हुई रस्सी टूट जाती है । मार्ग भटकने की स्थिति भी सामने आती है । व्यक्ति से कोई आवश्यक चीज खो जाती है ।                                               *केतु के अशुभ होने के पूर्व संकेत >*


मुँह से अनायास ही अपशब्द निकल जाते हैं ।


> कोई मरणासन्न या पागल कुत्ता दिखायी देता है ।


> घर में आकर कोई पक्षी प्राण-त्याग देता है ।


> अचानक अच्छी या बुरी खबरें सुनने को मिलती है ।


> हड्डियों से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।


> पैर का नाखून टूटता या खराब होने लगता है ।


> किसी स्थान पर गिरने एवं फिसलने की स्थिति बनती है ।


> भ्रम होने के कारण व्यक्ति से हास्यास्पद गलतियाँ होती हैं ।
ग्रह
स्वर नाड़ी ज्ञान
स्वर-साधना का ज्ञान
परिचय-
जिस तरह वायु का बाहरी उपयोग है वैसे ही उसका आंतरिक और सूक्ष्म उपयोग भी है। जिसके विषय में जानकर कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति आध्यात्मिक तथा सांसरिक सुख और आनंद प्राप्त कर सकता है। प्राणायाम की ही तरह स्वर विज्ञान भी वायुतत्व के सूक्ष्म उपयोग का विज्ञान है जिसके द्वारा हम बहुत से रोगों से अपने आपको बचाकर रख सकते हैं और रोगी होने पर स्वर-साधना की मदद से उन रोगों का उन्मूलन भी कर सकते हैं। स्वर साधना या स्वरोदय विज्ञान को योग का ही एक अंग मानना चाहिए। ये मनुष्य को हर समय अच्छा फल देने वाला होता है, लेकिन ये स्वर शास्त्र जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल है इसको सिखाने वाला गुरू मिलना। स्वर साधना का आधार सांस लेना और सांस को बाहर छोड़ने की गति स्वरोदय विज्ञान है। हमारी सारी चेष्टाएं तथा तज्जन्य फायदा-नुकसान, सुख-दुख आदि सारे शारीरिक और मानसिक सुख तथा मुश्किलें आश्चर्यमयी सांस लेने और सांस छोड़ने की गति से ही प्रभावित है। जिसकी मदद से दुखों को दूर किया जा सकता है और अपनी इच्छा का फल पाया जाता है।

प्रकृति का ये नियम है कि हमारे शरीर में दिन-रात तेज गति से सांस लेना और सांस छोड़ना एक ही समय में नाक के दोनो छिद्रों से साधारणत: नही चलता। बल्कि वो बारी-बारी से एक निश्चित समय तक अलग-अलग नाक के छिद्रों से चलता है। एक नाक के छिद्र का निश्चित समय पूरा हो जाने पर उससे सांस लेना और सांस छोड़ना बंद हो जाता है और नाक के दूसरे छिद्र से चलना शुरू हो जाता है। सांस का आना जाना जब एक नाक के छिद्र से बंद होता है और दूसरे से शुरू होता है तो उसको `स्वरोदय´ कहा जाता है। हर नथुने में स्वरोदय होने के बाद वो साधारणतया 1 घंटे तक मौजूद रहता है। इसके बाद दूसरे नाक के छिद्र से सांस चलना शुरू होता है और वो भी 1 घंटे तक रहता है। ये क्रम रात और दिन चलता रहता है।

जानकारी-
जब नाक से बाएं छिद्र से सांस चलती है तब उसे `इड़ा´ में चलना अथवा `चंद्रस्वर´ का चलना कहा जाता है और दाहिने नाक से सांस चलती है तो उसे `पिंगला´ में चलना अथवा `सूर्य स्वर´ का चलना कहते हैं और नाक के दोनो छिद्रों से जब एक ही समय में बराबर सांस चलती है तब उसको `सुषुम्ना में चलना कहा जाता है।

स्वरयोग-
योग के मुताबिक सांस को ही स्वर कहा गया है। स्वर मुख्यत: 3 प्रकार के होते हैं-

चंद्रस्वर-
जब नाक के बाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसको चंद्रस्वर कहा जाता है। ये शरीर को ठंडक पहुंचाता है। इस स्वर में तरल पदार्थ पीने चाहिए और ज्यादा मेहनत का काम नही करना चाहिए।

सूर्यस्वर-
जब नाक के दाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसे सूर्य स्वर कहा जाता है। ये स्वर शरीर को गर्मी देता है। इस स्वर में भोजन और ज्यादा मेहनत वाले काम करने चाहिए।

स्वर बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चल रहा हो तो उसे दबाकर बंद करने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से स्वर चल रहा हो उसी तरफ करवट लेकर लेटने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चलाना हो उससे दूसरी तरफ के छिद्र को रुई से बंद कर देना चाहिए।
ज्यादा मेहनत करने से, दौड़ने से और प्राणायाम आदि करने से स्वर बदल जाता है। नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से स्वर पर काबू हो जाता है। इससे सर्दियों में सर्दी कम लगती है और गर्मियों में गर्मी भी कम लगती है।
स्वर ज्ञान से लाभ-

जो व्यक्ति स्वर को बार-बार बदलना पूरी तरह से सीख जाता है उसे जल्दी बुढ़ापा नही आता और वो लंबी उम्र भी जीता है।
कोई भी रोग होने पर जो स्वर चलता हो उसे बदलने से जल्दी लाभ होता है।
शरीर में थकान होने पर चंद्रस्वर (दाईं करवट) लेटने से थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर मे किसी भी तरह का दर्द हो तो स्वर को बदलने से दर्द दूर हो जाता है।
दमे का दौरा पड़ने पर स्वर बदलने से दमे का दौरा कम हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिन में बायां और रात में दायां स्वर चलता है वो हमेशा स्वस्थ रहता है।
गर्भधारण के समय अगर पुरुष का दायां स्वर और स्त्री का बायां स्वर चले तो उस समय में गर्भधारण करने से निश्चय ही पुत्र पैदा होता है।
जानकारी-
प्रकृति शरीर की जरूरत के मुताबिक स्वरों को बदलती रहती है। अगर जरूरत हो तो स्वर बदला भी जा सकता है।

वाम स्वर
परिचय-
जिस समय व्यक्ति का बाईं तरफ का स्वर चलता हो उस समय स्थिर, सौम्य और शांति वाला काम करने से वो काम पूरा हो जाता है जैसे- दोस्ती करना, भगवान के भजन करना, सजना-संवरना, किसी रोग की चिकित्सा शुरू करना, शादी करना, दान देना, हवन-यज्ञ करना, मकान आदि बनवाना शुरू करना, किसी यात्रा की शुरूआत करना, नई फसल के बीज बोना, पढ़ाई शुरू करना आदि।

दक्षिण स्वर
परिचय-
जिस समय व्यक्ति का दाईं तरफ का स्वर चल रहा हो उस समय उसे काफी मुश्किल, गुस्से वाले और रुद्र कामों को करना चाहिए जैसे- किसी चीज की सवारी करना, लड़ाई में जाना, व्यायाम करना, पहाड़ पर चढ़ना, स्नान करना और भोजन करना आदि।

सुषुम्ना
परिचय-
जिस समय नाक के दोनों छिद्रों से बराबर स्वर चलते हो तो इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। उस समय मुक्त फल देने वाले कामों को करने से सिद्धि जल्दी मिल जाती है जैसे- धर्म वाले काम में भगवान का ध्यान लगाना तथा योग-साधना आदि करने चाहिए।

विशेष-
जो काम `चंद्र और `सूर्य´ नाड़ी में करने चाहिए उन्हे `सुषुम्ना´ के समय बिल्कुल भी न करें नही तो इसका उल्टा असर पड़ता है।

स्वर चलने का ज्ञान
परिचय-
अगर कोई व्यक्ति जानना चाहता है कि किस समय कौन सा स्वर चल रहा है तो इसको जानने का तरीका बहुत आसान है। सबसे पहले नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। फिर इस छिद्र को बंद करके उसी तरह से दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। नाक के जिस छिद्र से सांस लेने और छोड़ने में आसानी लग रही हो समझना चाहिए कि उस तरफ का स्वर चल रहा है और जिस तरफ से सांस लेने और छोड़ने मे परेशानी हो उसे बंद समझना चाहिए।

इच्छा के मुताबिक सांस की गति बदलना
परिचय-
अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से अपनी सांस की चलने की गति को बदलना चाहता है तो इसकी 3 विधियां है-
सांस की गति बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छेद से सांस चल रही हो, उसके दूसरी तरफ के नाक के छिद्र को अंगूठे से दबाकर रखना चाहिए तथा जिस तरफ से सांस चल रही हो वहां से हवा को अंदर खींचना चाहिए। फिर उस तरफ के छिद्र को दबाकर नाक के दूसरे छिद्र से हवा को बाहर निकालना चाहिए। कुछ देर तक इसी तरह से नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने से सांस की गति जरूर बदल जाती है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से सांस चल रही हो उसी करवट सोकर नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से छोड़ने की क्रिया को करने से सांस की गति जल्दी बदल जाती है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो सिर्फ उसी करवट थोड़ी देर तक लेटने से भी सांस के चलने की गति बदल जाती है।
प्राणवायु को सुषुम्ना में संचारित करने की विधि :
परिचय-
प्राणवायु को सुषुम्ना नाड़ी में जमा करने के लिए सबसे पहले नाक के किसी भी एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से सांस लेने की क्रिया करें और फिर तुरंत ही बंद छिद्र को खोलकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर निकाल दीजिए। इसके बाद नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस छोड़ी हो, उसी से सांस लेकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर छोड़िये। इस तरह नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने और फिर दूसरे से सांस लेकर पहले से छोड़ने से लगभग 50 बार में प्राणवायु का संचार `सुषुम्ना´ नाड़ी में जरूर हो जाएगा।

स्वर साधना का पांचो तत्वों से सम्बंध
परिचय-
हमारे शरीर को बनाने में जो पांच तत्व (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल) होते हैं उनमें से कोई ना कोई तत्व हर समय स्वर के साथ मौजूद रहता है। जब तक स्वर नाक के एक छिद्र से चलता रहता है, तब तक पांचो तत्व 1-1 बार उदय होकर अपने-अपने समय तक मौजूद रहने के बाद वापिस चले जाते हैं।

स्वर के साथ तत्वों का ज्ञान
परिचय-
स्वर के साथ कौन सा तत्व मौजूद होता है, ये किस तरह कैसे जाना जाए पंचतत्वों का उदय स्वर के उदय के साथ कैसे होता है और उन्हे कैसे जाना जा सकता है। इसके बहुत से उपाय है, लेकिन ये तरीके इतने ज्यादा बारीक और मुश्किल होते हैं कि कोई भी आम व्यक्ति बिना अभ्यास के उन्हे नही जान सकता।

जैसे-
नाक के छिद्र से चलती हुई सांस की ऊपर नीचे तिरछे बीच में घूम-घूमकर बदलती हुई गति से किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक खास आकार होता है। इसलिए निर्मल दर्पण पर सांस को छोड़ने से जो आकृति बनती है उस आकृति को देखकर उस समय जो तत्व मौजूद होता है, उसका पता चल जाता है।
शरीर में स्थित अलग-अलग चक्रों द्वारा किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जाता है।
हर तत्व का अपना-अपना एक खास रंग होता है। इससे भी तत्वों के बारे में पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक अलग स्वाद होता है। उसके द्वारा भी पता लगाया जा सकता है।
सुबह के समय तत्व के क्रम द्वारा नाक के जिस छिद्र से सांस चलती हो उसमे साधारणत: पहले वायु, फिर अग्नि, फिर पृथ्वी इसके बाद पानी और अंत में आकाश का क्रमश: 8, 12, 20, 16 और 4 मिनट तक उदय होता है।
जानकारी-

तत्वों के परिमाण द्वारा भी किसी तत्व की स्वर के साथ मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। इसका तरीका ये है कि बारीक हल्की रुई लेकर उसे जिस नाक के छिद्र से सांस चल रही हो, उसके पास धीरे-धीरे ले जाइए। जहां पर पहले-पहले रुई हवा की गति से हिलने लगे वहां पर रुक जाए और उस दूरी को नाप लीजिए। यदि वो दूरी कम से कम 12 उंगली की निकले तो पृथ्वी तत्व 16 अंगुल है, जल तत्व 4 अंगुल है, अग्नि तत्व 8 अंगुल है और वायु तत्व 20 अंगुल है तो आकाश तत्व की मौजूदगी समझनी चाहिए।

स्वर साधना के चमत्कार और उससे स्वास्थ्य की प्राप्ति
परिचय-
असल जिंदगी मे स्वर की महिमा बहुत ही ज्यादा चमत्कारिक है। इसके कुछ सरल प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं।
जानकारी-
सुबह उठने पर पलंग पर ही आंख खुलते ही जो स्वर चल रहा हो उस ओर के हाथ की हथेली को देखें और उसे चेहरे पर फेरते हुए भगवान का नाम लें। इसके बाद जिस ओर का स्वर चल रहा हो उसी ओर का पैर पहले बिस्तर से नीचे जमीन पर रखें। इस क्रिया को करने से पूरा दिन सुख और चैन से बीतेगा।
अगर किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाए तो उसके लक्षण पता चलते ही जो स्वर चलता हो उसको तुरंत ही बंद कर देना चाहिए और जितनी देर या जितने दिनो तक शरीर स्वस्थ न हो जाए उतनी देर या उतने दिनो तक उस स्वर को बंद कर देना चाहिए। इससे शरीर जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है और रोगी को ज्यादा दिनों तक कष्ट नही सहना पड़ता।
अगर शरीर में किसी भी तरह की थकावट महसूस हो तो दाहिने करवट सो जाना चाहिए, जिससे `चंद्र´ स्वर चालू हो जाता है और थोड़े ही समय में शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर के किसी भाग में किसी भी तरह का दर्द हो तो दर्द के शुरू होते ही जो स्वर चलता हो, उसे बंद कर देना चाहिए। इस प्रयोग को सिर्फ 2-4 मिनट तक ही करने से रोगी का दर्द चला जाता है।
जब किसी व्यक्ति को दमे का दौरा पड़ता है उस समय जो स्वर चलता हो उसे बंद करके दूसरा स्वर चला देना चाहिए। इससे 10-15 मिनट में ही दमे का दौरा शांत हो जाता है। रोजाना इसी तरह से करने से एक महीने में ही दमे के दौरे का रोग कम हो जाता है। दिन में जितनी भी बार यह क्रिया की जाती है, उतनी ही जल्दी दमे का दौरा कम हो जाता है।
जिस व्यक्ति का स्वर दिन में बायां और रात मे दायां चलता है, उसके शरीर में किसी भी तरह का दर्द नही होता है। इसी क्रम से 10-15 दिन तक स्वरों को चलाने का अभ्यास करने से स्वर खुद ही उपर्युक्त नियम से चलने लगता है।
रात को गर्भाधान के समय स्त्री का बांया स्वर और पुरुष का अगर दायां स्वर चले तो उनके घर में बेटा पैदा होता है तथा स्त्री-पुरुष के उस समय में बराबर स्वर चलते रहने से गर्भ ठहरता नही है।
जिस समय दायां स्वर चल रहा हो उस समय भोजन करना लाभकारी होता है। भोजन करने के बाद भी 10 मिनट तक दायां स्वर ही चलना चाहिए। इसलिए भोजन करने के बाद बायीं करवट सोने को कहा जाता है ताकि दायां स्वर चलता रहे। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है और व्यक्ति को कब्ज का रोग भी नही होता। अगर कब्ज होता भी है तो वो भी जल्दी दूर हो जाता है।
किसी जगह पर आग लगने पर जिस ओर आग की गति हो उस दिशा में खड़े होकर जो स्वर चलता हो, उससे वायु को खींचकर नाक से पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से या तो आग बुझ जाएगी या उसका बढ़ना रुक जाएगा .
स्वर साधना